
Vivek Verma
आंगन में पड़ी,
वो तीन खाली कुर्सियाँ,
हमेशा मुझे,
तुम्हारे अकेले होने की याद दिलाता है।
कैसे उन लम्हों को,
फिर से जी लूं,
और चाय की चुस्कियों पर,
तुम से चार बातें कर लूं,
उस हसरत को न दुहरा पाने का
अक्सर अफसोस मनाता है।
तुम से दूर होना,
ये मेरी ही बदकिस्मती है,
फिर भी इसे नियति का लिखा मान,
ज़िंदगी में आगे बढ़ जाना,
मेरी कोशिशों में ही
कहीं कोई कमी दिखाता है।
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